OLA का शेयर लाइफ लो पर, फिर भाविश ने क्यों बेची हिस्सेदारी? 'टाइमिंग' की इनसाइड स्टोरी!

जब ओला इलेक्ट्रिक (OLA Electric) का शेयर अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहा है और अपने सबसे निचले स्तर (Life Time Low) पर है, तभी खबर आती है कि कंपनी के फाउंडर और प्रमोटर भाविश अग्रवाल ने बल्क डील के जरिए 2.62 करोड़ शेयर बेचे हैं. 34.99 रुपये के एवरेज प्राइस पर भाविश को इस डील से 92 करोड़ रुपये मिले हैं. सवाल उठना लाजिमी है कि क्यों भाविश ने ठीक ये वक्त चुना, जब कंपनी को लेकर सेंटीमेंट्स पहले से ही खराब चल रहे हैं, जिसने शेयरों को जमीन पर पटक रखा है, भाविश की टाइमिंग सवाल खड़े करती है. 


Bhavish Aggarwal Sells Ola Stake when share is at life low; Inside Story Behind the Timing

देखिए जब भी किसी लिस्टेड कंपनी का प्रमोटर अपनी हिस्सेदारी बेचता है तो मार्केट सवाल पूछता है, क्यों? और जब बात देश की इलेक्ट्रिक व्हीकल ड्रीम के पोस्टर बॉय भाविश अग्रवाल और उनकी कंपनी ओला इलेक्ट्रिक की हो तो ये सवाल और भी बड़ा हो जाता है. 

अब इस सवाल का जवाब खोजने से पहले जरा ये देख लेते हैं कि कंपनी इसकी क्या वजह बता रही है. कंपनी का कहना है कि 

    • भाविश अग्रवाल ने अपनी व्यक्तिगत हिस्सेदारी का एक छोटा सा हिस्सा बेचा है. 
    • उन्हें 260 करोड़ रुपये का एक पुराना कर्ज़ पूरी तरह चुकाने में मदद मिलेगी.
    • पहले जो शेयर गिरवी रखे गए थे, करीब 3.93% वे सभी अब फ्री करा लिए जाएंगे.
    • इस बिक्री के बाद भी प्रमोटर ग्रुप के पास कंपनी में लगभग 34% हिस्सेदारी रहेगी.
    • कंपनी का नियंत्रण पहले जैसा ही रहेगा, इसमें किसी तरह का बदलाव नहीं होगा. 

कंपनी के बयान में कहा गया है कि कंपनी को बिना किसी गिरवी के बोझ के चलना चाहिए, ताकि बेवजह जोखिम या शेयर की कीमत में उतार-चढ़ाव न हो. इसलिए उन्होंने अपना व्यक्तिगत कर्ज पूरी तरह खत्म कर दिया है. जवाब और कारण तो काफी आदर्श हैं. 

हिस्सेदारी अभी क्यों बेची? 

अब सवाल पर वापस लौटते हैं, अभी ही क्यों? आखिर भाविश ने गिरवी शेयरों को छुड़ाने के लिए हिस्सेदारी बेचने का यही टाइम क्यों चुना जब कंपनी के शेयर लगातार कमजोर हो रहे हैं. वो थोड़ा इंतजार कर सकते थे, जब शेयर थोड़ा संभल जाते, तो उन्हें भी थोड़ी बेहतर डील मिल जाती. क्या 260 करोड़ रुपये के पुराने लोन को चुकाने के लिए कोई डेडलाइन थी, अगर थी तो ये बताना चाहिए, और अगर नहीं थी, तो जल्दबाजी क्यों? तो चलिए इसको जरा हौले-हौले समझते हैं. 

देखिए, आपके सामने जब शेर आ जाए तो आप क्या करेंगे? जवाब- आप क्या ही करेंगे, जो करेगा शेर करेगा. ठीक यही हो रहा है भाविश अग्रवाल और ओला के साथ. वो कुछ नहीं कर रहे हैं, बल्कि खराब वक्त या मजबूरी कह लें, उनसे ये सब करवा रहा है. देखिए चूंकि प्रमोटर ने कुछ प्रतिशत शेयरों को गिरवी रखा हुआ है. शेयर प्राइस गिरने से गिरवी शेयरों की वैल्यू भी तो घटेगी, और हर गिरावट लेंडर के लिए रिस्क बढ़ाती है. गिरावट जारी रही तो एक वक्त ऐसा भी आएगा कि मार्जिन कॉल ट्रिगर होने का खतरा मंडराने लगेगा. हालांकि हमें ये नहीं पता कि मार्जिन कॉल ट्रिगर हुई है या नहीं, लेकिन अगर गिरावट ऐसे ही जारी रहती है तो वो भी दूर नहीं होगा. 

क्या मजबूरी में लिया गया फैसला?

कहने का मतलब ये कि भाविश की ये स्टेक सेल स्ट्रैटेजिक कम, बल्कि मजबूरी में लिया गया फैसला ज्यादा लगता है, क्योंकि अगर वो आज शेयर नहीं बेचेंगे तो कुछ दिन बाद शेयर प्राइस इस लेवल पर आ जाएंगे कि मार्जिन कॉल ट्रिगर हो जाएगा, तब लेंडर पर दबाव इतना बढ़ेगा कि वो खुद ही गिरवी शेयरों को बेच देगा. तब भाविश और ओला के लिए सफाई देना मुश्किल होगा कि आखिर वो क्यों गिरवी शेयरों को छुड़ा नही पाए. तब स्थिति ज्यादा शर्मसार करने वाली होती, इसलिए उस स्थिति से बचने के लिए ये स्टेक सेल की गई लगता है. इसका फायदा ये है कि प्रमोटर की नाक भी बच गई, बताने के लिए कारण भी है कि स्टेक सेल क्यों बेची, थोड़ा स्ट्रैटेजिक फील भी आता है और नुकसान भी कम रहता है. 

हम ये नहीं कह रहे हैं कि भाविश का कदम पैनिक में उठाया गया है, बल्कि पहले से भांप कर जोखिम को नियंत्रित करने के लिए उठाया गया कदम लगता है. अगर इसमें अच्छी बात तलाशें तो यही समझ आता है कि स्टॉक पर प्लेज का प्रेशर हटेगा, फ्यूचर में रिकवरी आसान हो सकती है, लेकिन इसकी भी क्या गारंटी है, बस उम्मीद कर सकते हैं. 

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Comments

  1. Dear Sumit Sir,

    Excellent blog—your in-depth analysis, as always, is truly commendable. However, as I am not well-versed in Hindi, I faced some difficulty understanding a few terms. I would sincerely appreciate it if you could provide a translated version in the future, if possible and convenient for you.

    Once again, my heartfelt appreciation for your work.

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