लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन (LIC) के एक फैसले ने कंपनी को 16,500 करोड़ रुपये का फायदा पहुंचा दिया. कहानी है साल 2020 की जब अनिल अग्रवाल की कंपनी वेदांता भारतीय शेयर बाजार से डीलिस्ट होने की प्रक्रिया में थी. LIC का भी वेदांता में बड़ा निवेश था. डीलिस्टिंग के लिए वेदांता को LIC के शेयर चाहिए थे, लेकिन LIC ने शेयरों को उस भाव पर देने से इनकार कर दिया, जो भाव वेदांता ने ऑफर किया था. जिसका नतीजा ये हुआ कि वेदांता डीलिस्टिंग के लिए जरूरी शेयर नहीं जुटा सकी और डीलिस्टिंग फेल हो गई, और यही वजह है कि वेदांता आज भी लिस्ट है.
जब LIC ने वेदांता कह दिया 'NO'
अब इसका फायदा LIC को कैसे हुआ. इस कहानी को समझते हैं. भारत में डीलिस्टिंग के नियमों के तहत कंपनी को 90 प्रतिशत शेयरों को बायबैक करना होता है. इस हिसाब से वेदांता को 134 करोड़ शेयरों को वापस खरीदना था. लेकिन वेदांता 125.47 करोड़ शेयरों का ही इंतजाम कर पाई. यानी जरूरी कट ऑफ लिमिट को हासिल नहीं कर सकी. इसकी बड़ी वजह थी LIC.
क्योंकि LIC जिसके पास वेदांता के 6.37 प्रतिशत शेयर थे, उसने उस भाव पर शेयरों को देने से इनकार कर दिया, जो भाव वेदांता ने ऑफर किया था. वेदांता ने 87 रुपये पर शेयरों के बायबैक का ऑफर किया था, लेकिन LIC ने 320 रुपये प्रति शेयर मांगे. चूंकि LIC का बिड प्राइस, डिस्कवर्ड बिड प्राइस था. इसलिए कई शेयरहोल्डर्स ने भी इसी भाव पर बिडिंग लगाई. कई शेयरहोल्डर्स ने 150-160 रुपये की रेंज में भी बिडिंग लगाई. इसने वेदांता की पूरी कैलकुलेशन का बिगाड़ दिया, क्योंकि डीलिस्टिंग के नियमों के मुताबिक कंपनी को आम शेयरधारकों से डिस्कवर्ड प्राइस पर ही शेयरों को बायबैक करना होता है.
LIC को हुए फायदे की कैलकुलेशन समझिए
मई 2020 में जब वेदांता डीलिस्टिंग ऑफर लेकर आई, तब अगर LIC ने शेयरों को बेच दिया होता तो 87 रुपये के ऑफर प्राइस पर 22.2 करोड़ शेयरों के हिसाब से करीब 1,930 करोड़ रुपये मिलते, लेकिन LIC ने 320 रुपये के भाव पर बिड ऑफर की थी. अगर उस प्राइस पर शेयर बेचे होते तो LIC को मिलते करीब 7,100 करोड़ रुपये. चूंकि डीलिस्टिंग कामयाब नहीं हुई तो LIC के पास अब भी शेयर हैं. आज की तारीख में वेदांता के शेयरों का भाव 580 रुपये के करीब है. LIC के पास वेदांता के 5.70% शेयर हैं, उस हिसाब से LIC के पास वेदांता के जो शेयर मौजूद हैं उनकी वैल्यू 12,900 करोड़ रुपये के करीब है.
यानी 5 साल पहले अगर LIC ने वेदांता की डीलिस्टिंग ऑफर में शेयर बेच दिए होते तो उसको मिलते 1,930 करोड़ रुपये, लेकिन LIC ने डीलिस्टिंग में शेयर नहीं बेचे इसलिए अब उन्हीं शेयरों की वैल्यू पहुंच चुकी है 12,800 करोड़ रुपये. अब चूंकि मैंने ऊपर आपको बताया कि LIC ने 16,500 करोड़ रुपये की वैल्यू बनाई है. तो बाकी के 3,600 करोड़ रुपये कहां से आए.
5,600 करोड़ रुपये का डिविडेंड भी
हम ये कैसे भूल सकते हैं कि वेदांता डिविडेंड देने वाली कंपनी रही है. इसने इन पूरे 5 सालों के दौरान 252 रुपये प्रति शेयर का डिविडेंड भी दिया है. 22.2 करोड़ रुपये के हिसाब से डिविडेंड की रकम करीब 5,600 करोड़ रुपये बैठती है. यानी 12,900 + 5,600 = 18,500 करोड़ रुपये.
तो LIC ने 1,930 करोड़ रुपये नहीं लेकर शेयरों को अपने पास रखा तो कुल फायदा कितना हुआ, 18500-1930 करोड़ रुपये यानी करीब 16,570 करोड़ रुपये.
इसलिए LIC वेदांता की डीलिस्टिंग में शेयरों को नहीं बेचेने की स्ट्रैटेजिक कॉल ने LIC को बैठे बिठाए 16,500 करोड़ रुपये का फायदा करवा दिया. इसलिए निवेश में हमें कई बार तात्कालिक फायदा देखने की बजाय अगर दूर का नजरिया रखकर कदम उठाया जाए तो फायदा कई गुना बढ़ जाता है. इसको आसान शब्दों में कहें तो LIC का वेदांता में निवेश ये बताता है कि शेयर बाजार में सबसे बड़ा मुनाफा अक्सर जल्दी बेचने से नहीं, बल्कि सही वक्त पर न बेचने से बनता है.
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